अनुक्रमणिका
संपादकीय
‘भारतबोध’ पत्रिका का यह चौथा अंक है। अपेक्षा है कि सिख गुरु परम्परा की उपस्थिति पर केन्द्रित यह अंक सुधी पाठकों की ‘भारतीयता के बोध’ को समृद्ध बनाएगा। भारत के ऐश्वर्य से आकर्षित होकर यवन, पठान, मुगल, डच, फ्रांसीसी, पुर्तगाली, अंग्रेज इत्यादि विदेशी आक्रान्ता आये और अपनी सामर्थ्यनुसार लूट कर ले गये। इन आक्रान्ताओं से लड़ने के लिए समय-समय पर भारतीय महापुरुषों ने शस्त्र और शास्त्र को धारण किया। इस संदर्भ में श्रीमद्भागवत गीता का यह श्लोक याद आता है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवतिभारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।
मध्यकाल का प्रारम्भ ही भक्ति केन्द्रित है। भक्ति एक संवाद-सेतु बनकर उभरी। प्रश्न खड़ा होता है कि हम भक्तिको समझें कैसे? क्या यह सिर्फ भजन-कीर्तन है? अपनी अखिल भारतीयता में भक्ति कीर्तनिया-मंडली नहीं है। आठवीं शताब्दी में केरल के कलाडी से निकले आदि शंकराचार्य, दसवीं ग्यारहवीं शताब्दी में तमिलनाडू के श्रीपेरंबदूर से निकले रामानुजाचार्य, तेरहवीं शताब्दी में वर्तमान कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के उडुपी शिवल्ली के पास स्थित पाजक नामक गाँव से निकले मध्वाचार्य, चौदहवीं शताब्दी में वर्तमान प्रयाग से निकले रामानंदाचार्य, पंद्रहवीं शताब्दी में वर्तमान दक्षिण भारत के कंकरवाड से निकले बल्लभाचार्य, पंद्रहवीं शताब्दी में वर्तमान असम प्रान्त के नौगाँव के बरदोवा नामक स्थान से निकले श्रीमंत शंकरदेव और पंद्रहवीं शताब्दी में ही वर्तमान पाकिस्तान के ननकाना साहिब से निकले गुरु नानकदेव सहित सिख गुरुओं की पूरी परम्परा में क्या समानता है? वह कौन बिंदु है जहाँ ये महानुभाव संवाद करते नजर आते हैं? वह बिंदु है – सांस्कृतिक सहभाव। आप पूरी भक्ति परम्परा का मूल्यांकन कर लीजिए, सभी संतों के यहाँ एक तथ्य सर्वमान्य ढंग से मिलेगा और वह है- सांस्कृतिक सहभाव। भारतवर्ष को समझने का सहभाव, तीर्थ सहभाव और ज्ञानार्जन का. सहभाव। मैंने जिन महानुभावों का नाम लिया उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा यात्राओं में बीतता है। ऐसा क्यों है? क्या ऐसा अनायास है? ऐसा अनायास नहीं है।…