भारत होने का भाव

अनुक्रमणिका संपादकीय जब हम भारतबोध पर विचार करते हैं, तो सबसे पहले यह जिज्ञासा मन में आती है कि भारतबोध क्या है? भारत क्या है? भारतबोध पर विचार करते समय हमारा उद्देश्य किसी तात्कालिक राजनीतिक विमर्श का समर्थन या प्रतिवाद Read More …

गोस्वामी तुलसीदास और लोक प्रज्ञा

अनुक्रमणिका संपादकीय हिंदी साहित्य के सहस्र वर्षों की यात्रा में भक्तिकाल एक ऐसा स्वर्णिम पड़ाव है, जहाँ भारतीय काव्य-प्रतिभा का प्रकर्ष प्रकट होता है। गोस्वामी तुलसीदास इस प्रकर्ष के शिखर पर विराजमान हैं। किसी कविता की चरम सार्थकता तब होती Read More …

रानी दुर्गावती

अनुक्रमणिका संपादकीय ‘भारतबोध’ पत्रिका का यह चौथा अंक है। यह अंक भी सुधि पाठकों के वैचारिक पटल को समृद्ध बनाने में सहायक सिद्ध हो यही प्रयास है। यह अंक भारत के इतिहास में वीरता, साहस और नेतृत्व का प्रतीक कही Read More …

रंग का लोक

अनुक्रमणिका संपादकीय उत्सवधर्मी भारत की सांस्कृतिक पहचान यहां के विविध कला रूपों में दृष्टिगोचर होती है। भारत एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रज्ञाभाव है। यह प्रज्ञाभाव विविध प्रदर्शनकारी कलाओं में अभिव्यक्त होता है लोकनाट्य सहित अन्यान्य प्रदर्शनकारी कलाएं इसी भारतभाव Read More …

कला का गढ़ छत्तीसगढ़

अनुक्रमणिका संपादकीय देश के अलग-अलग भू-भागों में भारतीय संस्कृति अपने अलग-अलग स्वरूप में संचरित होती रहती है। मदन मोहन मालवीय जी ने कहा है-“भारत की एकता का मुख्य आधार एक संस्कृति है, जिसका प्रवाह कहीं नहीं टूटा। यही इसकी विशेषता Read More …

पूर्वोत्तर भारत और हिंदी

अनुक्रमणिका संपादकीय पूर्वोत्तर और हिंदी के प्रेम की कहानी पुरानी है। पन्द्रहवीं शताब्दी में असमिया के एक बहुत प्रसिद्ध कवि हुए श्रीमंत शंकरदेव। श्रीमंत शंकरदेव असम सहित संपूर्ण प्राग्ज्योतिषपुर के समाज, साहित्य और जीवन-बोध के केंद्र में हैं। जब भक्तिकाल Read More …

सिख गुरुओं का योगदान (विशेष संदर्भ पूर्वोत्तर भारत)

अनुक्रमणिका संपादकीय ‘भारतबोध’ पत्रिका का यह चौथा अंक है। अपेक्षा है कि सिख गुरु परम्परा की उपस्थिति पर केन्द्रित यह अंक सुधी पाठकों की ‘भारतीयता के बोध’ को समृद्ध बनाएगा। भारत के ऐश्वर्य से आकर्षित होकर यवन, पठान, मुगल, डच, Read More …

मुखौटा कला विशेषांक

अनुक्रमणिका संपादकीय ‘भारतबोध’ पत्रिका का यह तीसरा अंक है। विगत दो अंकों की भाँति यह अंक भी सुधी पाठकों के वैचारिक पटल को समृद्ध बनाने में सहायक सिद्ध हो, यही प्रयास है। यह अंक भारत की एक समृद्ध प्रदर्शनकारी विधा Read More …

महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव केंद्रित विशेषांक

अनुक्रमणिका संपादकीय हमारा बौद्धिक दायित्व है कि हम देश के विभिन्न प्रांतों एवं उनमें बोली जाने वाली भाषाओं और मान्यताओं में निहित भारतीय सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक एकता के मूल्यों से संवाद करें, जो भारतभाव के हेतु हैं। इस उद्देश्य से Read More …

संपादकीय

भारतबोध का यह प्रथम अंक है। आशा है कि संस्कृति, साहित्य, रंगमंच, मानविकी, समाज विज्ञान, लोकलालित्य, प्रदर्शनकारी कलाओं और शिल्प कलाओं की यह शोध पत्रिका आप सभी की बौद्धिक तथा लोकसांस्कृतिक जिज्ञासाओं को शांत करने का माध्यम बनेगी। कला, साहित्य Read More …