अनुक्रमणिका
संपादकीय
हिंदी साहित्य के सहस्र वर्षों की यात्रा में भक्तिकाल एक ऐसा स्वर्णिम पड़ाव है, जहाँ भारतीय काव्य-प्रतिभा का प्रकर्ष प्रकट होता है। गोस्वामी तुलसीदास इस प्रकर्ष के शिखर पर विराजमान हैं। किसी कविता की चरम सार्थकता तब होती है, जब वो मंत्र बन जाए। आदिकवि वाल्मीकि ने जिस रामकथा को यथासंभव एक इतिहासकार की तटस्थता के साथ संस्कृत महाकाव्य में निरूपित करके गाया, तुलसी ने उस महागाथा को भक्ति के रस से सींचकर, लोकभाषा में ढालते हुए, लोकमंगलकारी स्वरूप देकर जन-जन के कंठ का भूषण बना दिया। तुलसी के इस महाकाव्य ने भारतीय लोक के चित्त को जिस प्रकार स्पर्श किया है, वैसा भक्तिकाल सहित किसी भी काल के. किसी भी कवि की, किसी भी रचना ने संभवतः नहीं किया।
प्रश्न उठता है कि तुलसी की इस विराट सफलता का रहस्य क्या है? क्या कारण है कि पाँच शताब्दी से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी उनका सृजन लोगों को निरंतर आकर्षित कर रहा है? यह कहना तो उचित नहीं होगा कि तुलसी ने रामकथा को अपने महाकाव्य का विषय बनाया इसलिए जन-जन तक पहुँच गए। क्योंकि, रामकथा पर तो अनेक कवियों ने रचना की है, परंतु लोकप्रियता के स्तर पर किसीकी रचना ‘रामचरितमानस’ के आसपास भी नहीं ठहरती।…
-
मेरी बात : रामकथा जग मंगल करनी- आचार्य (डॉ.) चन्दन कुमार
-
तुलसी की भक्तिपद्धति- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
-
सामाजिक आदर्श का प्रस्थापक तुलसी का राम-राज्य- (डॉ) अमित सिंह
-
तुलसीदास कृत रामचरितमानस में लोकतत्व- कमलेश कमल
-
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन और रामचरितमानस- ज्योति कुमारी
-
रामकथावाचन और लोकजागरण- प्रमोद भार्गव
-
तुलसी की राजनीतिक दृष्टि- पीयूष कुमार दुबे
-
भारतीय परिवार-बोध और रामचरितमानस- (डॉ) मोनिका शर्मा
-
श्रीराम, रामायण और हमारा इतिहास- राजीव रंजन प्रसाद
-
रामकथा का लौकिक सौंदर्य- (डॉ) राजेश श्रीवास्तव
-
रामचरितमानस में लोकाचारों का महत्व निरूपण- (डॉ) रमाकान्त राय
-
रामचरितमानस’ में जनसाधारण का जीवन- (डॉ) विनय विश्वास
-
तुलसी के काव्य में आर्थिक चिंतन- सतीश सिंह