अनुक्रमणिका
संपादकीय
जब हम भारतबोध पर विचार करते हैं, तो सबसे पहले यह जिज्ञासा मन में आती है कि भारतबोध क्या है? भारत क्या है? भारतबोध पर विचार करते समय हमारा उद्देश्य किसी तात्कालिक राजनीतिक विमर्श का समर्थन या प्रतिवाद करना नहीं है अपितु उस दीर्घकालिक सांस्कृतिक चेतना को समझना है, जिसके भीतर भारत स्वयं को हजारों वर्षों से जानता और जीता आया है। ‘भारत क्या है?’ – यह प्रश्न केवल भूगोल, संविधान या शासन-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है; यह स्मृति, सातत्य, कला, लीला, भक्ति और समाज-केंद्रित जीवन-दृष्टि का प्रश्न है। ‘भारतबोध’ पत्रिका का यह अंक इसी प्रश्नाकुलता से जन्म लेता है कि भारत को किन शब्दों, किन अनुभवों और किन सांस्कृतिक सूत्रों से समझा जाए। क्या भारत को पश्चिमी ‘नेशन-स्टेट’ की संकीर्ण शब्दावली में बाँधा जा सकता है, या फिर भारत एक जीवंत सभ्यता है, जिसकी आत्मा लीला, कला और सनातन चेतना में निरंतर स्पंदित होती रही है? इस अंक को इन प्रश्नों के आलोक में ही पढ़ा और समझा जाना चाहिए।…
संपादकीय : भारतबोध का लीला लोक : आचार्य (प्रो.) चन्दन कुमार
1.Mata Bharata- आनंद केंटिश मुथु कुमारस्वामी
2.THE LAND OF INDIA- ए. एल. बाशम
3.The Soul Of India- केवलराम रतनमल मलकानी
4.Indian Culture- कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी
5.The Gita and War- क्रिस्टोफर इशरवुड
6.मातृभूमि- डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल
7. भारतीय संस्कृति और राष्ट्र- निर्मल वर्मा
8.Aim of the Vedanta : The destruction of an innate error- पॉल ड्यूसेन
9. अखण्ड भारत : साध्य और साधन- पण्डित दीनदयाल उपाध्याय
10. ON THE EXACT MEANING OF THE WORD HINDU- रेने गुएनॉन
11. भारतीयता की खोज- विद्यानिवास मिश्र
13. ON HINDUISM- भगिनी निवेदिता