संपादकीय
“ भारत होने का भाव"
खंड-5, अंक-2, जुलाई-दिसम्बर, 2025,पृष्ठ संख्या- 88
जब हम भारतबोध पर विचार करते हैं, तो सबसे पहले यह जिज्ञासा मन में आती है कि भारतबोध क्या है? भारत क्या है? भारतबोध पर विचार करते समय हमारा उद्देश्य किसी तात्कालिक राजनीतिक विमर्श का समर्थन या प्रतिवाद करना नहीं है अपितु उस दीर्घकालिक सांस्कृतिक चेतना को समझना है, जिसके भीतर भारत स्वयं को हजारों वर्षों से जानता और जीता आया है। ‘भारत क्या है?’ - यह प्रश्न केवल भूगोल, संविधान या शासन-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है; यह स्मृति, सातत्य, कला, लीला, भक्ति और समाज-केंद्रित जीवन-दृष्टि का प्रश्न है। ‘भारतबोध’ पत्रिका का यह अंक इसी प्रश्नाकुलता से जन्म लेता है कि भारत को किन शब्दों, किन अनुभवों और किन सांस्कृतिक सूत्रों से समझा जाए। क्या भारत को पश्चिमी ‘नेशन-स्टेट’ की संकीर्ण शब्दावली में बाँधा जा सकता है, या फिर भारत एक जीवंत सभ्यता है, जिसकी आत्मा लीला, कला और सनातन चेतना में निरंतर स्पंदित होती रही है? इस अंक को इन प्रश्नों के आलोक में ही पढ़ा और समझा जाना चाहिए।
लीला क्या है? लीला लोक क्या है? भारतबोध का लीला लोक क्या है? लीला और कला के माध्यम से हमारा समाज और हमारे लोगों ने भारतबोध को कैसे संजोया है? सनातन, लीला, कला और भारत के बीच के संबंध को कैसे पढ़ा जाए? क्या भारत की सातत्यता के सूत्र सनातन की सातत्यता के पाठ से गुम्फित हैं? प्रश्न यह भी है कि इस सनातन की सातत्यता को हम पढ़े कैसे? सत्य यह है कि लीला, कला और धर्मभाव की यह सातत्यता ही भारतबोध है। इस भारतबोध को जिन तत्वों ने संभव किया, वे संत हैं, कवि हैं, मठ और सत्र हैं, मंदिर और नामघर हैं, संस्कृत है। गुरु, वैद्य और पुरोहित की सामाजिक वैधता भारत होने को संभव करती है। भारत राजनीतिक, भौगोलिक, प्रशासनिक इकाई होने से पूर्व एक सांस्कृतिक अवधारणा है। हमारा राष्ट्र हमारे सांस्कृतिक बोध की निष्पत्ति है। सत्य, अहिंसा, परोपकार, क्षमा जैसे गुणों के साथ यह राष्ट्र ज्ञान में रत रहा है, इसीलिए यह 'भा-रत' है। भारतबोध को इन्हीं भक्ति, सत्य, अहिंसा, परोपकार, क्षमा, कला और लीला के उत्तराधिकारी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। भारत की आत्मा सनातन है...