रंग का लोक

अनुक्रमणिका

संपादकीय

उत्सवधर्मी भारत की सांस्कृतिक पहचान यहां के विविध कला रूपों में दृष्टिगोचर होती है। भारत एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रज्ञाभाव है। यह प्रज्ञाभाव विविध प्रदर्शनकारी कलाओं में अभिव्यक्त होता है लोकनाट्य सहित अन्यान्य प्रदर्शनकारी कलाएं इसी भारतभाव को समाहित किए हुए हैं। लोकनाट्य किसी भी समाज के आधारस्तंभ के रूप में प्रचलित होते हैं। यह उस पूरे समाज के जीवनानुभवों को अपने में समाहित किए होता है। लोकनाट्य साहित्यशास्त्र के बने बनाए नियमों की कसौटी से अलग होते हैं। यह लोक की कसौटी पर कसे जाते हैं और उस पर यह खरे उतरते हैं। लोकनाट्य का देशज स्वरूप कलाकार, शैली या अभिनय को स्वाभाविकता देता है। भारतीय लोकनाट्य एक ओर संस्कृति के प्रमुख महाकाव्यों, पुराणों तथा गाथाओं से प्रेरणा ग्रहण करते हैं तो दूसरी ओर लोकनाट्य स्वाभाविकता, अभिनय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।

संस्कृत नाटकों के व्यवस्थित एवं नियमानुसार अनुशासित नाटकों को देखकर यह आभास होता है कि उससे पूर्व भी कोई लोकनाट्य परंपरा मौजूद रही होगी। यही नाट्य-परंपरा संस्कृत के नाटकों के विकास का कारण भी सिद्ध हुई तो वही लोक में भारतीय पारंपरिक लोकनाट्य की अनेक शैलियों में मुखरित होकर समाज का मार्गदर्शन करती रही। लोकनाट्य ने सदैव भारत रूपी शरीर में आत्मा बनकर उसकी संस्कृति और जनमानस को जीवित रखा। लोकनाट्य हमारे समाज में व्याप्त रामलीला, भाड़, नौटंकी, आल्हा, बिदेसिया, रासलीला, लौंडा नाच, विदापत नाच, झुमुर जैसे प्रचलित लोकनाट्यरूपों के माध्यम से भारतीय संस्कृति, उसके मूल्यों, संस्कारों, प्रज्ञा आदि को अक्षुण्ण रखे हुए है। लोकनाट्य वर्तमान समय में भी जीवन अभिव्यक्ति का या भारतीय समाज की अभिव्यक्ति का माध्यम बना हुआ है।

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अनुक्रमणिका

  1. संपादकीय- आचार्य (डॉ.) चन्दन कुमार
  2. नौटंकी – आदिल सैफी 
  3. झुमुरा – अनंत कुमार मिश्र 
  4. रामलीला- अवंतिका सिंह 
  5.  बाउल परंपरा- अनिल कुमार 
  6.  विदापत नाच- अरविंद कुमार मिश्र 
  7. ख्याल- अरविंद मीणा  
  8. संवादमूलक रामलीलाएँ एवं प्रदर्शन-विधान- आशुतोष 
  9. बिदेसिया- ऐश्वर्या झा 
  10. काशी का लोकरंग और भारतेन्दु- ऋतु वाष्र्णेय 
  11. भवाई- कल्याण कुमार 
  12. झुमुर- गौतम लामा 
  13. स्वांग’ का स्त्री पक्ष- चंद्रकला सिंह 
  14.  ब्रजभूमि की रासलीला- पूनम शर्मा 
  15.  पहाड़ी लोकनृत्य- ममता कुमारी 
  16. डोमकछ- मुन्ना कुमार राय 
  17.  नाचा- योगेन्द्र चौबे 
  18. पंजाब की लोकनाट्य परंपरा- योजना कालिया 
  19. मैथिली रंगमंच- राहुल सिद्धार्थ 
  20. लोकनाट्य कठपुतली- रूचि शर्मा 
  21. नल दमयन्ती- शोभा कौर 
  22. हरियाणवी सांग- सरिता 
  23. कुमाऊँ-गढ़वाल की लोकनाट्य- साधना कुशवाहा 
  24. ईसुरी : प्रस्तुति विधान विरासत- सारिका कालरा 
  25. संस्कृत का रंगमंच और सिनेमा- सूर्यप्रकाश पांडेय / यशार्थ मंजुल 
  26.  Narsi Bhagat’s Bhaat – Saroj Bala

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