अनुक्रमणिका
संपादकीय
‘भारतबोध’ पत्रिका का यह तीसरा अंक है। विगत दो अंकों की भाँति यह अंक भी सुधी पाठकों के वैचारिक पटल को समृद्ध बनाने में सहायक सिद्ध हो, यही प्रयास है। यह अंक भारत की एक समृद्ध प्रदर्शनकारी विधा ‘मुखौटा-कला’ पर केंद्रित है। उद्देश्य है-भारत की संपन्न सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण-संवर्धन और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप प्रदर्शनकारी कलाओं के उन्नयन को महत्व प्रदान करना। आपको ज्ञात है कि असम की मुखौटा कला की अपनी नैसर्गिक विशेषताएं हैं, जो एक कलाप्रेमी और साहित्यानुरागी समाज को अनवरत आकृष्ट करती रहती हैं। मुखौटा-कला पर केंद्रित ‘भारतबोध’ का यह नवीन अंक इन्हीं भावों को प्रतिध्वनित करता है।
‘कला’ मानवीय गुणों की भावनात्मक अभिव्यक्ति है। कला सामाजिक जीवन के विकास मूल्यों की सम्यक संरचना का आधार है। कला किसी समाज में पाए जाने वाले उच्चतम मूल्यों और आदर्शों की वह चेतना है जो व्यक्ति को मनुष्य बनाए रखती है। कला सौंदर्यशास्त्रीय सृजनात्मकता का प्रतीक भी है। वास्तव में कलाओं का जन्म ही हुआ है मनुष्यता का विस्तार करने के लिए। जो कला मानवता का प्रसार नहीं कर पाती, वह दीर्घजीवी नहीं होती। नाट्यकला हमारे जीवन का पर्याय है। नाट्यकला की दृश्यात्मकता उसे व्यापक बनाती है। इसी व्यापकता का एक आयाम है मुखौटा-कला।…
- संपादक की कलम से- प्रो. चन्दन कुमार
- 1. मुखौटा : आहार्य का अभिनय होना-नंदकिशोर आचार्य
- 2. मुखौटे, रंगकर्म और आज का जीवन-जयदेव तनेजा
- 3. मुखौटा-कला और रंगकर्म- प्रो. ज्ञानतोष कुमार झा
- 4. लोक नाट्य परंपरा में मुखौटा-कला और महापुरुष माधवदेव-डॉ. अमित सिंह
- 5. असमिया संस्कृति का एक अन्य पहलू : मुखौटा-कला- माधुर्ज्य कमल हजारिका
- 6. मुखौटा-कला : एक सांस्कृतिक अध्ययन- आदित्य कुमार मिश्रा
- 7. मुखौटा कला और रंगमंच- सूर्य प्रकाश
- 8. मुखौटा-कला के विविध आयाम एक अध्ययन- मीनाक्षी
- 9. श्रीमंत शंकरदेव के नाटकों में मुखौटा कला- पुरबी कलिता