अनुक्रमणिका
संपादकीय
हमारा बौद्धिक दायित्व है कि हम देश के विभिन्न प्रांतों एवं उनमें बोली जाने वाली भाषाओं और मान्यताओं में निहित भारतीय सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक एकता के मूल्यों से संवाद करें, जो भारतभाव के हेतु हैं। इस उद्देश्य से भक्ति आंदोलन से बहुत कुछ सीखा जा सकता है क्योंकि भक्ति आंदोलन एक अखिल भारतीय स्वरूप ग्रहण करता है, जिसमें देश में पहली बार प्रांत भेद, जाति भेद, भाषा भेद, संप्रदाय भेद आदि से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और मानवता की बात की गई है। सभी संतों और भक्तों के चिंतन में अखंड भारत की सोच है, सांस्कृतिक एकता की भावना है। आज हम पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण चतुर्दिक भारत भाव को जीते हैं तो वह संतों और भक्तों का योगदान है।…
- 1. संपादक की कलम से- प्रो. चंदन कुमार
- 2. प्राग्ज्योतिष क्षेत्र की समरसता के उन्नायक : श्रीमंत शंकरदेव- डॉ. कृष्ण गोपाल
- 3. शंकरदेव की जीवनी- बापचन्द्र महंत
- 4. भक्ति आंदोलन और शंकरदेव- प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय
- 5. रामाख्यानक परंपरा में श्रीमंत शंकरदेव की कृतियों का मूल्यांकन – प्रो. दिनेश चौबे
- 6. शंकरदेव और सूरदास के काव्य में वर्णित ‘गोपी- उद्धव’ संवाद का तुलनात्मक अध्ययन- डॉ. विजय मणि त्रिपाठी
- 7. महान संत श्रीमंत शंकरदेव और असम की सत्र परंपरा- वीरेन्द्र परमार
- 8. असम के जनसमुदाय पर श्रीमंत शंकरदेव का प्रभाव- अखिल चन्द्र कलिता
- 9. भारतीय सांस्कृतिक एकात्मता के सेंतु पुरुष : श्रीमंत शंकरदेव- विभव भूषण त्रिपाठी
- 10. श्रीमंत शंकरदेव और मुखौटा कला- आदित्य कुमार मिश्र
- 11. श्रीमंत शंकरदेव द्वारा पोषित मूल्यों में व्याप्त लोकतंत्र- वैभव सिंह
- 12. श्रीमंत शंकरदेव और गुरु जम्भेश्वर की वाणी का सामाजिक सरोकार- रवि कुमार
- 13. नववैष्णव धर्म और श्रीमंत शंकरदेव- पुरबी कलिता
- 14. श्रीमंत शंकरदेव की नाट्य-कला- मणि कुमार
- 15. भारतीयता एवं सामाजिक समरसता के अग्रदूत : श्रीमंत शंकरदेव- डॉ. सुनील कुमार शॉ